Home विशेष पाठक समाचार ..द रियल ट्रेलर……..लेख:- मि.महेशकुमार लांजेवार

..द रियल ट्रेलर……..लेख:- मि.महेशकुमार लांजेवार

47
0
SHARE
इत्तफाक कहे या संजोग एक लंबा अर्सा बीतें,मेरी मुलाकात एक हसिन मेहबूबा से हो रहि होती है और वो मुझे अपनी बाहोंमे थामके कहती है,चलों कहीं दूर चलें..?मैनें उससे कहा जान-ए-मन अभी नहीं?फिलहाल मेरे कंधोपर कुछ बोझ है, पहले उसे उतार लूँ फिर बेशक?..और उसने मेरी बात मान भी लीं।उस मेहबूबा का नाम था मौत?..जी हाँ,मृत्यु।…..    उसके पुछने पर जवाब देते हुए मैंने कहा मुझपे बोझ है अपने आप का,परिवार का,मेरे देश का इस समाज का जिसमें मैंने जन्म लिया।अपने लिए हर सख्स जी लेता है,मैं चाहता हूँ के मेरे नाम पर,मेरे खून पर ये इल्जाम ना रहे,कि समाज के लिए जरा भी पसीना नहीं टपकाया।
इसी जज्बे के साथ मैंने चंदवर्षोंसे समाज कार्यमें हिस्सा लिया और ताजा अनुभव किया, कि लोग अधिकतर समाज के प्रतिनिधि बनकर आपस में(मिथ्या) मान-स्वाभिमान, भाव-स्वभाव कि लडाई लड रहें।कोई समझौता करने तयार नहीं किसीको पद् का लालच,किसीको शोहरत,किसीको नाम कि चाहत।कोई चाहता है समाज कि भूख मीटें,कोई चाहता है उसे “समाजभूषण”मिलें,कोई कथनी को मायना देता है, तो कोई करनी को ।कोई यकीन माने या ना माने,जितना बन पडा मैंने बिखरे हुए आशिआने को शवारने कि बडी सिध्दत से कोशिश कीं लेकिन नतीजा ज्यों का त्यों…।समाज में कर्मठ कार्यकर्ताओं कि कद्र नहीं होती है।यदि ऐसा हि चलता रहा तो सिर्फ व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर मिडिया अखबारों में प्रतिनिधित्व करनेवालों का एडोटाइझ हि होता रहेगा,समाज का विकास नहीं..?
यह सामाजिक स्थीति देखकर मेरा हि नहीं,किसी भी खूद्दार कार्यकर्ता का मन उबने लगेगा।यदि मैं समाजकार्य से मुँह मोड लूँ तो उसका कारण स्वयं समाज कि यह बिगडी दशा होगी,मेरी कमजोरी नहीं।
मेरी बात,हजार में नौ सौ नब्बे लोगों को पसंद ना भी आए,तो मुझे ऐतराज नहीं?..मैं सिर्फ उन दस लोगों का मोहताज़ हूँ,जो नौ सौ नब्बे के बराबर होते है।
इसके बावजूद भी इंसान नहीं जागता,तो कहना गलत नहीं होगा कि वो एक जिंदगी से भटके उस मुसाफिर कि तरहा है जो अपनेआप से छल कर रहा होता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here