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सरकारी पक्ष साबित नहीं कर पाया संतोष की लिप्तता

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नागपुर. मोका के मामले में जिला सत्र न्यायालय द्वारा संतोष आम्बेकर को निर्दोष साबित किए जाने के बाद इस आदेश को चुनौती देते हुए भले ही सरकारी पक्ष की ओर से हाईकोर्ट में अपील दायर की गई, किंतु सुनवाई के दौरान रमणीकभाई पारेख की हत्या के प्रयास में संतोष की लिप्तता होने की बात सरकारी पक्ष साबित नहीं कर पाया. दोनों पक्षों की ओर से दी गई लंबी दलीलों के बाद न्यायाधीश पी.एन. देशमुख और न्यायाधीश स्वप्ना जोशी ने जिला सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले पर मुहर लगाते हुए सरकारी पक्ष की अपील ठुकरा दी. संतोष की ओर से अधि. आर.के. तिवारी और सरकार की ओर से सहायक सरकारी वकील देशमुख ने पैरवी की. विशेषत: जिला सत्र न्यायालय की ओर से न केवल संतोष आम्बेकर को निर्दोष करार दिया गया था बल्कि उसके साथी नीलेश केदार और महेन्द्र भुरे को भी आईपीसी की धारा 307, 120 बी और मोका कानून की धारा 3 के तहत निर्दोष करार दिया गया था.

जेल में रची गई थी साजिश
अभियोजन पक्ष के अनुसार संतोष आम्बेकर के खिलाफ मोका कानून के तहत विशेष अदालत में मामला चल रहा था, जिसमें रमणिकभाई पारेख महत्वपूर्ण गवाह थे. जिससे पारेख को इस सुनवाई से दूर रखने के लिए जेल में साजिश रची गई. एक अन्य मामले में सेंट्रल जेल में सजा भुगत रहे विनोद चामट नामक आरोपी के साथ मिलकर षड़यंत्र रचा गया. जेल से रिहा होते ही चामट ने बिनू शर्मा और महेन्द्र भुरे नामक युवक को रमणिकभाई की हत्या की सुपारी दी. 6 जुलाई 2002 को रमणिकभाई अपने पुत्र कमलेश और भरत के साथ कार में जा रहे थे. इसी दौरान कस्तूरचंद पार्क के पास बिनू शर्मा ने रमणिकभाई पर बंदूक से फायर किया, जिसमें तीनों गंभीर रूप से घायल हुए थे. उनकी शिकायत पर सीताबर्डी पुलिस ने अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ धारा 307 और 34 के तहत मामला दर्ज किया था.

सरकार के पास सबूत ही नहीं
अभियोजन पक्ष के अनुसार जांच के बाद पुलिस ने संतोष आम्बेकर और उसके साथी नीलेश केदार, बिनू शर्मा, महेन्द्र भुरे को गिरफ्तार कर लिया जबकि चामट फरार था. सत्र न्यायालय में सुनवाई के दौरान 15 गवाहों के बयान दर्ज किए गए. लंबी चली सुनवाई के बाद विशेष अदालत ने कोई भी पुख्ता सबूत नहीं होने और संदेह का लाभ देते हुए अभियुक्तों को निर्दोष बरी कर दिया जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील तिवारी का मानना था कि हत्या के प्रयास में आम्बेकर के शामिल होने के सरकार के पास कोई भी सबूत नहीं है. यहां तक कि साजिश में होने की बात भी साबित नहीं की जा सकी. सुनवाई के बाद अदालत ने उक्त आदेश जारी किया.

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